उत्तर प्रदेश की जलवायु (उत्तर प्रदेश की जलवायु कैसी है।) उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से कितनी ऋतु होती हैं।

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   उत्तर प्रदेश की जलवायु  भौगोलिक विषमताओं के कारण उत्तर प्रदेश की जलवायु में विभिन्न प्रकार की क्षेत्रीय विषमताए पाई जाती हैं। फिर भी सामान्य रूप से प्रदेश की जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसूनी*( अर्थात समशीतोष्ण उष्ण कटिबंधीय या उपोष्ण मानसूनी ) है।   यहां वर्ष भर में तीन ऋतुए घटित होती हैं। उत्तर प्रदेश की जलवायु (उत्तर प्रदेश की जलवायु कैसी है।) उत्तर प्रदेश में मुख्य रूप से कितनी ऋतु होती हैं। इसे भी पढ़ें 👉 click here 👉 उत्तर प्रदेश का भौतिक विभाजन  https://www.upspecial1st.in/2021/10/Uttar-Pradesh-Ka-Bhautik-Vibhajan.html ग्रीष्म ऋतु-  सूर्य के कर्क रेखा की ओर बढ़ने के साथ ही प्रदेश के तापमान में वृद्धि होना शुरू हो जाता है और जून   में अपने उच्चतम बिंदु पर पहुंच जाता है। इस समय सूर्य कर्क रेखा पर सीधे चमकता है। • ग्रीष्म ऋतु में प्रदेश का औसत अधिकतम तापमान 36°C से 39°C तक तथा औसत न्यूनतम तापमान  21°C से 23°C तक तथा औसत तापांतर 14°C रहता है। • प्रदेश में सबसे अधिक गर्मी आगरा व झांसी जिले में होती है तथा सबसे कम गर्मी बरेली में पढ़ती है। इस...

उत्तर प्रदेश की प्रमुख जनजातियां Uttar Pradesh ki anusuchit janjatiya

उत्तर प्रदेश की प्रमुख जनजातियां

 उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जनजातियों की संख्या कुल संख्या का बहुत कम भाग है। 2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश में अनुसूचित जनजातियों की कुल संख्या 11 लाख 34 हजार 273 (0.6%) है। राज्य के सोनभद्र जिले में अनुसूचित जनजातियों की संख्या (3,85,018) सबसे अधिक है। उसके बाद बलिया में और सबसे कम बागपत में है राज्य में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों में थारू, बुक्सा, खरवार, सहरिया आदि मुख्य हैं।

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भारत सरकार ने सर्वप्रथम सन 1967 में प्रदेश की 5 जनजातियों( थारू, बुक्सा, भोटिया, जौनसारी व राजी) को अनुसूचित जनजति श्रेणी में सूचीबद्ध किया था। किंतु वर्तमान में (जौनसारी व राजी) जनजातियां उत्तराखंड की प्रमुख जनजातियां हैं। बाद में 2003 में प्रदेश की 10 और जनजातियों (1. गोंड झुरिया नायक ओझा पठारी वा राजगोंड 2. खरवार/खैरवार 3. सहरिया 4. परहिया 5. बैगा। 6. पंखा,पनिका 7. अगरिया 8. पठारी 9. चेरो 10. भुइया,भुनिया) को अनुसूचित जनजाति किस श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया।जिनका सामाजिक/सांस्कृतिक परिचय इस प्रकार है- 

थारू

 

 थारू किरात वंश के हैं। जो कई उपजातियों में विभाजित हैं। थारू नाम की उत्पत्ति के विषय में कुछ विद्वानों का कहना है कि यह लोग राजपूताना के 'थार' मरुस्थल से आकार यहां बसे हैं अतः इन्हें थारू कहते हैं। थारू लोग उत्तर प्रदेश में पाए जाते हैं। ये प्रदेश के तराई क्षेत्र के महाराजगंज, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, श्रावस्ती, बहराइच व लखीमपुर जिलों के उत्तरी भागों में निवास करते हैं।

थारू लोग कद में छोटे, चौड़ी मुखाकृति और पीले रंग के

होते हैं। पुरुषों से स्त्रियां कहीं अधिक आकर्षक और सुंदर होती हैं।

पारंपरिक थारू पुरुष धोती पहनते हैं और बड़ी चोटी रखते हैं, जो हिंदुत्व का प्रतीक है।

इनका मुख्य भोजन चावल है इसके अलावा ये दाल, रोटी, दूध, दही तथा मांस-मछली भी खाते हैं।

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थारू जनजाति में पहले संयुक्तमातृसत्तात्मक परिवार प्रथा पाई जाती थी लेकिन अब इसमें काफी बदलाव हो रहा है।

थारू समाज में विवाह प्रायः बिना दहेज के होता है विवाह का खर्च प्रायः दोनों पक्ष मिलकर उठाते हैं।

इनमें विवाह रस्म का संपादन भर्रा (पुरोहित) द्वारा कराया जाता है विवाह के अवसर पर विशेष भोज का प्रचलन है।

यह लोग हिंदू धर्म को मानते हैं। इनके अनेक देवी देवता होते हैं ।ये भूत-प्रेत तथा जादू-टोना आदमी भी विश्वास करते हैं।

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यह लोग हिंदुओं के सभी त्यौहार मानते हैं।

• होली के दिनों में ये खूब उल्लास मनाते हैं या पर फाल्गुन पूर्णिमा से कई दिनों तक लगातार मनाया जाता है।

•इनकी अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान है। यह लोग मुख्यता धान की खेती करते हैं, इसके अतिरिक्त दाले,तिलहन, गेहूं तथा सब्जी की भी खेती करते हैं।

इनके मुख्य व्यवसाय पशुपालन, लकड़ी कटाई, शिकार, वन्य भूमियों से लकड़ी, जड़ी-बूटी, फल-फूल एकत्र करना आदि है।

• लखीमपुर जनपद में एक महाविद्यालय थारू जनजाति के लड़के-लड़कियों को शिक्षा प्रदान करने हेतु स्थापित किया गया है।जहां पर बड़ी संख्या में यह शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।और उच्च सरकारी पदों पर कार्य कर रहे हैं।

बुक्सा


प्रदेश में बुक्सा जनजाति बिजनौर जिले में छोटी-छोटी ग्रामीण बस्तियों में निवास करती है। बुक्सा जनजाति पतवार राजपूत घराने से संबंध रखती है। ऐसा अधिकांश लोगों की मानना है। कुछ विद्वान इन्हें मराठों द्वारा भगाए जाने के बाद यहां आकर बसे हैं ऐसा मानते हैं।
बुक्सा पुरुष लोगों का कद और आंखें छोटी होती हैं उनकी पलकें भारी, चेहरा चौड़ा एवं नाक चपटी होती हैं इनका मुख्य भोजन मछली और चावल है। इसके अतिरिक्त यह लोग मक्का व गेहूं की रोटी और दूध दही का प्रयोग करते हैं। इनके अधिकांश पुरुषों में मद्यपान की आदत होती है। इन लोगों में बंदर, गाय और मोर का मांस खाना वर्जित होता है।

बुक्सा जनजाति में भी सामाजिक स्तरीकरण का स्वरूप देखा जाता है बुक्सा ब्राम्हण समाज में सबसे ऊंचा स्थान रखते हैं, उसके बाद क्रमशः क्षेत्रीय बुक्सा, अहीर बुक्सा, नाई बुक्सा आदि होते हैं। गोत(गोत्र) इनके समाज की मूल इकाई है। सभी भेदों के बाद भी गांव में एक साथ मिलकर रहते हैं।

• इनके विवाह एक अनुबंध मात्र होता है। जो पति-पत्नी में से कोई भी किसी समय भंग कर सकता है।

इनके परिवार का स्वरूप हिंदू समाज के समान है। अधिकांश परिवार में संयुक्त तथा विस्तृत परिवार का स्वरूप दिखाई पड़ता है।साथ ही केंद्रीय परिवार भी है। अब धीरे-धीरे इनकी संख्या में वृद्धि हो रही है।

ये लोग महादेव, काली माई, दुर्गालक्ष्मी, राम, कृष्ण की पूजा करते हैं काशीपुर की चामुंडा देवी सबसे बड़ी देवी मानी जाती हैं।इनके व्रत व त्यौहार हिंदुओं के समान होते हैं।

इनकी बिरादरी पंचायत प्रमुख राजनीतिक संगठन है जो समाज में न्याय एवं शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तरदाई है। बिरादरी पंचायत चार स्तरों में बैठी है जिन के सर्वोच्च अधिकारी तखत, मुंसिफ, दरोगा और सिपाही नाम से जाने जाते हैं।

गांव की पंचायत में तीन स्तर होते हैं सरपंच, ग्राम पंचायत का सभापति और मुखिया।

कृषि के अतिरिक्त बुक्सा जनजाति के लोग गाय,भैंस, बकरी पालते हैं, जिनका दूध भी प्रयोग किया जाता है।

खरवार/खैरवार

 

 खरवार जनजातियां प्रदेश के मिर्जापुर, सोनभद्र, देवरिया, बलिया व गाजीपुर जिलों में निवास करते हैं। यह अपने को सूर्यवंशी मानते हैं तथा स्वयं को रोहतास से आया हुआ बताते हैं। इनकी पारंपरिक आर्थिक गतिविधियों में कृषि, पशुपालन व शिकार आदि शामिल है। परंतु कुछ इतिहासकार कहते हैं कि खरवार जनजातियां कत्थे का व्यापार करती थी

इनकी उप जातियों में सूरजवंशी, पटबंदी, दौलतबंदी, खेरी, राउत, मौगती, मोझयाली,गोजूं गर्मियां आदि है। यह शरीर से बलिष्ठ व बहादुर होते हैं इनकी वाणी में कर्कशता अधिक देखी जाती है तथा किसी शब्द का उच्चारण खींचकर करते हैं।

ये मुख्यता हिंदू धर्म के रीति-रिवाजों का पालन करते हैं। ये लोग वनसन्ती,दूल्हा देव,घमसान,गोरइया,शिव, दुर्गा, हनुमान आदि देवी-देवताओं के अतिरिक्त जंतुओं में नाग आदि की पूजा करते हैं।

उत्तर प्रदेश की प्रमुख जनजातियां Uttar Pradesh ki anusuchit janjatiya


इस जनजाति के लोग मांसाहारी और शाकाहारी दोनों प्रकार के होते हैं।

प्रारंभ में यह लोग जंगलों में शिकार, कृषि, पशुपालन और लकड़ी काटने का काम करते थे लेकिन अब सरकार द्वारा इन क्रियाओं को प्रतिबंधित कर देने के कारण इन्हें मजबूर होकर भिक्षाटन करना पड़ता है। क्योंकि इनके पास कृषि योग्य भूमि नहीं है। क्योंकि इनके पास कृषि योग्य भूमि नहीं है। कभी-कभी इन्हें बंधुआ मजदूरों का भी जीवन व्यतीत करना पड़ता है।

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